मंगलवार, 15 अगस्त 2017

मैं भारत का वंशज हूं

मैं भारत का वंशज हूं
स्वाभिमान से गदगद हूं
गौरवशाली हैं परंपराएं 
देख संस्कृति पुलकित हूं

सृष्टि के आदि से ही है
गौरवशाली यह देश धरा
वेद पुराण और उपनिषद्
सबने मार्ग प्रशस्त किया
रामायण महाभारत से
सदा होता रहा प्रेरित हूं
मैं भारत का वंशज हूं
स्वाभिमान से गदगद हूं

दुनिया को मानवता का
संदेश जहां से जाता है
माना सारी दुनिया को
परिवार यहां पर जाता है
सादा जीवन उच्च विचार
कर देता आह्लादित है
मैं भारत का वंशज हूं
स्वाभिमान से गदगद हूं

भारत सोने की चिड़िया
दुनिया में कहलाता था
विश्व गुरु की उपमा से
जिसको जाना जाता था
उस ज्ञान सरोवर का चिंतन,
कर मंत्रमुग्ध हो जाता हूं
मैं भारत का वंशज हूं
स्वाभिमान से गदगद हूं

लाखों आए हथियार लिए
खूब किए प्रयास गए
फिर भी भारत जिंदा है
हजारों साल बीत गए
नमन है ऐसी दृढ़ता को
हो जाता नतमस्तक हूं
मैं भारत का वंशज हूं
स्वाभिमान से गदगद हूं ।
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भारत के 71वें स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं । वन्दे मातरम् । जय हिंद।
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रविवार, 2 जुलाई 2017

पितृ देवो भव

मात्र जन्म दाता नहीं
वरन ईश्वर का
एक अहसास है
पिता
सुखद जीवन के लिए
जीवन पर्यन्त
मखमली आभास है
पिता
कुदरत द्वारा प्रदत्त
सुरक्षा और प्रगति का
एक विश्वास है
पिता
पितृ देवो भव
सच है चूंकि
जीवन के लिए
एक वरदान है
पिता ।।

बुधवार, 7 मार्च 2012

चल खेलेंगें होली

होली के अवसर पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं॥
राधा-कृष्ण संग हो ली
देख साथ गोपियां हो ली
ग्वालों की टोली संग हो ली
चल मिलकर खेलेंगें होली
वह भी हो ली
तुम भी हो ली
सब तैयारी हो ली
चल मिलकर खेलेंगें होली
रंगों की शुरुआत है हो ली
रंगों की बौछार है हो ली
सतरंगी बरसात है हो ली
चल मिलकर खेलेंगें होली
सब मिलकर खेलेंगें होली
हम मिलकर खेलेंगें होली ॥

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

आया बसंत


गुरुवार, 13 जनवरी 2011

त्योहार

लोहड़ी और मकर संक्रांति के अवसर पर आपको हार्दिक शुभकामनाएं
चाहिए की प्रेम बयार बहे
ना बैर भाव आपस में रहे
हर दिल में चैन करार बसे
जब शांति और सद्भाव बढे
मानवता एक धर्म रहे
क्या लोहड़ी
क्या संक्रांति
तब हर दिन ही त्योहार मने ||

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

हो मंगलमय उत्कर्ष

 नव वर्ष के अवसर पर मेरी ओर से हार्दिक शुभकामनाएं
नई उम्मीद
नया विश्वास
नया सफर
नई शुरुआत
मैं कर रहा हूं
इस चाहत के साथ
कि
दीवाली से बीतें दिन
माह रहें मधुमास
साल रहें ऎसे जैसे
जीवन को सौगात
हर दिन,माह और वर्ष
हो सुखों का स्पर्श
समृद्धि का साथ रहे
हो मंगलमय उत्कर्ष ॥

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

शुभ दीपावली

सूरज की आभा से 
आगाज़ हो चुका है
रोशन ज़माना 
चहुं ओर हो चुका है
है दीवाली की सुबह
सब ओर इक उमंग है
आज हर दिल 
बना इक पतंग है
दिन खुशनुमा है
रात भी खास होगी
हर दीये की अंधेरे से
कड़ी जंग होगी
मां लक्ष्मी भी 
मेहरबान होंगी
खुशियों की भरपूर 
बरसात होगी 
फिर आयेगी 
दुनिया में खुशहाली
ना वैर-भाव की
कोई बात होगी
क्या तेरी क्या मेरी
आज 'हम' की बात होगी
है तेरी भी दुनिया
है मेरी भी दुनिया
प्रगति और सद्भाव की
शुरुआत होगी॥

गुरुवार, 13 मई 2010

ब्लॉग संचार

हिन्दी ब्लॉग जगत के प्रचार और प्रसार के लिए हम सभी के द्वारा प्रयासों की आवश्यकता है। क्योंकि विश्व स्तर पर तथा ब्लॉग जगत में हिन्दी का स्थान अभी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। एतदर्थ हिन्दी ब्लॉग टिप्स के सुझाव के अनुसारएक ब्लॉग एग्रीगेटर बनाया है ‘‘ब्लॉग संचार’’ आपसे अनुरोध है कि अपने ब्लॉग को यहां शामिल करें और दूसरों से भी करवायें


सोमवार, 10 मई 2010

हो सकता है ऐसा भी

हालात आज के देख- देखकर
मुझको लगता है कभी-कभी
पूरी दुनिया बदल जाएगी
हो सकता है ऐसा भी

घी-दूध के सपने लेगा
इनको तरसेगा व्यक्ति
शायद बन जायें इंजेक्शन
हो सकता है ऐसा भी

जनता की लाचारी देखो
भूख मिटाने को बने गोलियां
हो सकता है ऐसा भी

गुरु शिष्य की परंपरा
हो बात ज़माने बीते की
एक मेज पर बैठ पीयेंगे
हो सकता है ऐसा भी

क्या होगा भविष्य प्रेम का
जब होगा कामुक हर प्रेमी
अवैध प्रेम बन जाये
हो सकता है ऐसा भी

परिचय पत्र बनाने लगेंगे
जिनसे सिद्ध ईमानदारी होगी
उस पर भी मोल लिखा होगा
हो सकता है ऐसा भी

क्षमा चाहता हूँ आपसे
सुधर जाऊंगा मैं भी
पर क्या सुधरेगी दुनिया
हो सकता है ऐसा भी ||

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

अच्छा लगता है

तेरी यादों में खो जाना अच्छा लगता है

और आंखों में ख़्वाब सजाना अच्छा लगता है


दुनिया की दौलत तो हमसे कब की छूट गयी

ग़म का अब अनमोल ख़जाना अच्छा लगता है


उनके घर भी इक दिन इक चिंगारी भड़केगी

जिनको घर-घर आग लगाना अच्छा लगता है


वो सैयाद की साजिश से नावाकिफ़ होता है

जब पंछी को आबो-दाना अच्छा लगता है


सच कहता फिरता है जो झूठे इन्सानों को

मुझको वो पागल दिवाना अच्छा लगता है


बात चली जब महफ़िल में तो ज़िक्रे उल्फ़त पर

तेरी पलकों का झुक जाना अच्छा लगता है॥


साभार : श्री गुलशन मदान


शनिवार, 10 अप्रैल 2010

निशाना

क्या दौर आ गया है
ये देखकर
दिल सहम जाता है
ताज्जुब होता है
कि
आज का आदमी
कितना बहादुर है
खुद शीशे के
मकां में रहता है
औरों पर
पत्थर से
निशाना लगाता है|

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

क्या देगा, उससे दान.....

आज आपके लिए गुलशन मदन की एक गज़ल

भूगोल उसका पेट है, विज्ञान भूख है
मुफ़लिस से ब्रह्म ज्ञान की बातें न कीजिए

लड़ना है आपको तो लड़ें अमन के लिए
ये तीर और कमान की बातें न कीजिए

दौलत बशर के पास कभी है, कभी नहीं
दौलत की झूठी शान की बातें न कीजिए

खुद जी रहा जो दूसरों के हक़ को छीनकर
क्या देगा, उससे दान की बातें न कीजिए
......................


दोस्तों, जिस साहित्य सभा कैथल हरियाणा के प्रयास के फल-स्वरुप मैं आपसे मुखातिब होने का साहस जुटा पाया आज उसी साहित्य सभा कैथल ने ब्लॉग संसार में कदम रखा है और आपसे स्वागत की अपेक्षा रखता हूँ | अपने स्नेहिल वचनों से इस पौधे को जरुर अभिसिंचित करें | जरुर आइयेगा:-
www.sahityasabhakaithal.blogspot.com


रविवार, 21 मार्च 2010

तू साथ चल

प्रिय पाठको ,
नव संवत्सर की शुभकामनाएं। शुभकामनाओं में विलम्ब के लिए क्षमा-प्रार्थी हूं। पर हां,स्मरण रहे मेरी शुभकामनाएं हमेशा आपके साथ हैं । आपसे बहुत समय पहले एक वायदा किया था कि आपको कैथल (हरियाणा) के साहित्य-धर्मियों से और उनकी रचनाओं से परिचित कराऊंगा तो शुरुआत कर रहा हूं ।
कैथल के प्रसिद्ध गज़ल़कार गुलशन मदान से जो किसी परिचय के मोहताज मुझे जान नहीं पड़ते।उनके बारे में अगली प्रस्तुति में विस्तार से बताऊंगा ,पर आज उनके चंद शेर जो आपके दिमाग में उनकी पहचान बनाने में सक्षम मालूम होते हैं। लीजिए प्रस्तुत हैं -
बनके मेरा हमकदम तू साथ चल
कुछ तो हो तन्हाई कम तू साथ चल ।
खुश नहीं तू भी बिछड़ने से मेरे
मेरे भी दिल में हैं गम तू साथ चल ॥

दुनिया से कुछ ध्यान हटाकर देखो तो
खुद को इक आवाज लगाकर देखो तो।
भूल से भूल नहीं पाओगे तुम
दिल से अपने मुझे भुलाकर देखो तो ॥

बहुत गहरे उतर कर लिख रहा हूं
मैं कतरे को समन्दर लिख रहा हूं।
मैं अपने दिल का यह सब हाल शायद
तुम्हें अपना समझकर लिख रहा हूं॥
शेष अगली बार ... कईं रचनाएं... पूरे परिचय के साथ ।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

कल मानव की तैयारी(१४११)

है फिक्र किसको
है फुरसत किसे

कौन मिट गया
कौन मिट रहा
नहीं सरोकार
किसी बात से
सिवा खुद के
है चाहता कोई किसे
हर आदमी बस जी रहा
स्वार्थ-निहित जिंदगी
चाहता हर-पल यही
सब करें उसकी बंदगी
कल मिटी इंसानियत
आज बाघ की बारी है
मिट रहा आज बाघ तो
कल मानव की तैयारी है
पर,
फर्क क्या इस बात से
बदल गया है वक्त

इंसानियत के बिना
दिखता नहीं मनुष्यत्व
इस तरह तो अपना भी
नहीं रहेगा अस्तित्व
सच मानिए
अकेला चना
फोड सकता भाड
संपूर्ण प्राणी-जगत की
हमें चाहिए आड
जरूरत है हमें सबकी
अपने लिए
अपना संसार सुंदर
बनाए रखने के लिए
हो जिंदगी सबकी
इस तरह तो दूर तक
नहीं दिखाई कोई देगा
सोचो , एक बार
एकाकी जीवन होगा
बस अपना जीवन.......


बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

उधार

वह कुछ दिन से मोबाइल लेने की सोच रहा था। आज मन बना कर बेटे की दुकान पर गया और बोला,'' बेटा,मुझे भी एक मोबाइल दे दो '' बेटा बोला,'' ले लीजिए डैडी ,पर हाँ... आजकल मैंने उधार देना बन्दकर दिया है।'' बेटे का जवाब सुनकर वह कुछ देर के लिए असमंजस में पड़ गया और कुछ संभलते हुए बस इतना ही कहा- ''ठीक है बेटा,जब पैसे होंगे तब खरीद लूंगा।'' फिर इसके बाद वह मन में उठते हुए अनेक निरुत्तर सवालों का जवाब ढूंढ़ने निकल पड़ा

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट