शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

शुभ दीपावली


दीपोत्सवं
भवतु मंगलमयम्


हम कामना करते हैं -
प्रकाशपर्व दीवाली समस्त विश्व को शान्ति , सौहार्द्र , प्रेम और भाई-चारे से आलोकित
करे एवं सर्वत्र सुख तथा समृद्धि लाये |

सोमवार, 28 सितंबर 2009

कुरुक्षेत्र से आपके के लिए

आपके लिए कुरुक्षेत्र से कुछ छाया-चित्र                                                                         बिरला मन्दिर


जयराम विद्यापीठ के प्रांगन में स्थित पितामह भीष्म की प्रतिमा

जयराम विद्यापीठ के प्रांगन में दंत-दान करते कर्ण

जयराम विद्यापीठ के प्रांगन में स्थित मन्दिर

शनिवार, 15 अगस्त 2009

जलियांवाला बाग से

हर भारतीय को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ | हमारे लिए १५ अगस्त का दिन बहुत महत्त्वपूर्ण है | आज के ही दिन तो हम भारतीय लम्बी दासता से मुक्त हुए थे | ये दिन जश्न मनाने का तो है ही पर उन शहीदों को भी याद करने का है जिनकी शहादत से आज हम भारतीय गौरवान्वित महसूस करते हैं | आइए, इस अवसर पर आपको जलियांवाला बाग (अमृतसर) ले चलें जहां हुई १३ अप्रैल १९९९ की घटना को राष्ट्रकभी नहीं भूला पाएगा | जनरल डायर की दरिन्दगी की कहानी यह बाग आज भी बयान करता है | ऐसे इस पावनस्थान के कुछ छायाचित्र आपके लिए प्रस्तुत हैं जो किसी तीर्थ से कदापि कम नहीं कहा जा सकता |

जलियां वाला बाग का प्रवेश द्वार
यह है वह स्थान जहां से गोलियां बरसाईं गयी वह कुआं जिसमें जान बचाने के लिए लोगों ने छलांग लगा दी थी
शहीद स्मारक
वह दीवार जिस पर गोलियों के निशान हैं
वह दीवार जिस पर गोलियों के निशान हैं
सतत प्रकाशमय अमर ज्योति
अमर शहीदों को प्रणाम करने के अनुरोध के साथ एक बार फिर
स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ
जय हिंद


बुधवार, 5 अगस्त 2009

चित्रकूट धाम

विंध्य पर्वत के उत्तर में है चित्रकूट धाम। यह न केवल एक धार्मिक स्थान है, बल्कि अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के कारण भी काफी चर्चित है।

शांति : चित्रकूट पर्वत मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश, दोनों राज्यों की सीमाओं को घेरता है। वनवास के दौरान भगवान राम ने अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ सबसे अधिक समय तक यहीं निवास किया था। यात्रियों को चित्रकूट गिरि, स्फटिक शिला, भरत कूप, चित्रकूट-वन, गुप्त गोदावरी, मंदाकिनी की यात्रा करने से आध्यात्मिक शांति मिलती है। चित्रकूट गिरि को कामद गिरि भी कहते हैं, क्योंकि इस पर्वत को राम की कृपा प्राप्त हुई थी। राम-भक्तों का विश्वास है कि कामद गिरि के दर्शन मात्र से दुख समाप्त हो जाते हैं। इसका एक और नाम कामतानाथ भी है।

अनुसूइया की तपोभूमि : चित्रकूट में 'पयस्विनी' नदी है, जिसे मंदाकिनी भी कहते हैं। इसी के किनारे स्फटिक शिला पर बैठ कर राम ने मानव रूप में कई लीलाएं कीं। इसी स्थान पर राम ने फूलों से बने आभूषण से सीता को सजाया था। पयस्विनी के बायीं ओर प्रमोद वन है, जिससे आगे जानकी कुंड है। यहां स्थित अनुसूइया आश्रम महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी अनुसूइया की तपोभूमि कहलाती है। कहते हैं कि अत्रि की प्यास बुझाने के लिए अपने तप से अनुसूइया ने पयस्विनी को प्रगट कर लिया। गुप्त गोदावरी की विशाल गुफा में सीताकुंड बना हुआ है। कामदगिरि के पीछे लक्ष्मण पहाड़ी स्थित है, जहां एक लक्ष्मण मंदिर है। इसके अलावा, चित्रकूट में बांके सिद्ध, पम्पा सरोवर, सरस्वती नदी (झरना), यमतीर्थ, सिद्धाश्रम, हनुमान धारा आदि भी है। राम-भक्त कहते हैं कि राम जिस स्थान पर रहते हैं, वह स्थान ही उनके लिए अयोध्या के समान हो जाता है।

पयस्विनी चित्रकूट की 'अमृतधारा' के समान है। मंदाकिनी नाम से जानी जाने वाली पयस्विनी को कामधेनु और कल्पतरु के समान माना जाता है। शिवपुराण के रुद्रसंहिता में भी पयस्विनी का उल्लेख है।

तुलसी-रहीम की मित्रता : वाल्मीकि मुनि ने चित्रकूट की खूब प्रशंसा की है। तुलसीदास ने माना है कि यदि कोई व्यक्ति छह मास तक पयस्विनी के किनारे रहता है और केवल फल खाकर राम नाम जपता रहता है, तो उसे सभी तरह की सिद्धियां मिल जाती हैं।

रामायण और गीतावली में भी चित्रकूट की महिमा बताई गई है। दरअसल, यही वह स्थान है, जहां भरत राम से मिलने आते हैं और पूरी दुनिया के सामने अपना आदर्श प्रस्तुत करते हैं। यही वजह है कि इस स्थान पर तुलसी ने भरत के चरित्र को राम से अधिक श्रेष्ठ बताया है। देश में सबसे पहला राष्ट्रीय रामायण मेला चित्रकूट में ही शुरू किया गया। तुलसी-रहीम की मित्रता की कहानी आज भी यहां बड़े प्रेम से न केवल कही, बल्कि सुनी भी जाती है। रहीम ने कहा--जा पर विपदा परत है, सो आवत यहि देश

उल्लेखनीय है कि नानाजी देशमुख का ग्रामोदय विश्वविद्यालय, आरोग्य/धाम, विकलांगों के लिए स्वामी रामभद्राचार्य विश्वविद्यालय यहीं स्थित है ।

साभार :जागरण YAHOO! India

रविवार, 12 जुलाई 2009

पाठकों से

प्रिय पाठकों ,

आपका यह हिन्दी ब्लॉग साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सांस्कृतिक है | जिस पर आपने शुरू में कविताएँ , कहानी तथा हाल ही में कुछ तीर्थों के बारे में पढा | हम चाहते हैं कि आप भी इस में भागीदार बनें इसलिए अगर आपके पास ऐसी सामग्री है तो हमें मेल करें | आप साथ में सामग्री से सम्बंधित चित्र भी भेज सकते हैं | आपकी रचना का स्तरीय होना जरुरी है | चयन एवं संपादन का अधिकार ब्लॉग के पास रहेगा | हम आपकी रचना का इंतजार करेंगे |
हमारा पत्ता :-

शनिवार, 27 जून 2009

सरस्वती तीर्थ (पेहवा)

सरस्वती तीर्थ (पेहवा)
कुरूक्षेत्र से 25 कि0मी0 के दूरी पर उत्तर पश्चिम में एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है पेहवा। कहा जाता है कि सप्त सरस्वतियों में से एक ओघवती सरस्वती कुरूक्षेत्र में प्रवाहित होती है। इस विषय में प्राप्त शास्त्रोक्त जानकारी के अनुसार यहां सरस्वती प्रवाहित होती है। जिसका स्वरूप अब बदल चुका है। इसमें वर्षा ऋतु में ही पानी दिखाई देता है। सरस्वती के बारे में जो जानकारी हमें प्राप्त होती है तदनुसार पता चलता है कि सरस्वती सम्पूर्ण नदियों में श्रेष्ठ एवं पाप नाशक नदी है तथा ब्रह्मलोक से आई है। सप्तसरस्वती का संगम होने के कारण पेहवा में सरस्वती तीर्थ है। इस स्थान को श्राद्ध आदि कर्म के लिए भी विशेष दर्जा दिया गया है तथा संपूर्ण भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर से श्रद्धालु श्राद्धकर्म हेतु यहां आते हैं। पृथद्क शब्द से इस स्थान का नाम पेहवा पड़ा है। यहां पर निर्मित सरस्वती तीर्थ में लाखों लोग अमावस्या के अवसर पर स्नान करते हैं तथा पितरों के निमित श्राद्धादि कार्य करते हैं।

गुरुवार, 25 जून 2009

जमदग्नि स्थल -जाजनपुर

हरियाणा में कैथल से उत्तरपूर्व की ओर 28 किलोमीटर की दूरी पर जाजनापुर गाँव स्थित है। यहां महर्षि जगदग्नि का आश्रम था। अब यहां एक सरोवर अवशेष रूप में हैं। यहां प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की दसवीं को मेला लगता है। महर्षि जगदग्नि की परम्परा में बाबा साधु राम ने जहां तपस्या की है और अपने शरीर का त्याग किया है। उस स्थान को बाबा साधु राम की समाधि के रूप में पूजा जाता है।
इस सरोवर की आज भी विशेष बात यह मानी जाती है कि इसमें पानी भरने के बाद फूंकार-हंकार की आवाज आती है। पूर्ण लबालब भरा सरोवर भी पन्द्रह दिनों में सुख जाता है। सांपों की इस जगह अधिकता माना जाती है। लेकिन आज तक कोई नुकसान नहीं हुआ।
जनश्रुति के अनुसार महर्षि जगदग्नि ऋचीक के पुत्र और भगवान परशुराम के पिता थे। इनके आश्रम में इच्छित फलों को प्रदान करनी वाली गाय थी जिसे कार्तवीर्य छीनकर अपनी राजधानी माहिष्मति ले गया। परशुराम को जब यह ज्ञात हुआ तो उन्होंने कार्तवीर्य को मार दिया ओर कामधेनु वापिस आश्रम में ले आए और एक दिन अवसर पाकर कीर्तवीर्य के पुत्रों को भी मार डाला और समस्त पृथ्वी पर घूम-घूमकर इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया तब उन्होंने अपने पिता के मस्तक को धड़ से जोडा और उनका अन्त्येष्टि संस्कार सम्पन्न किया। कुरूक्षेत्र भूमि में पांच कुण्ड बनाकर पितरों का तर्पण किया। ये पांचों सरोवर समन्त पंचक-तीर्थ के नाम से विख्यात हुए। जिसे ब्रह्मा जी उतर वेदी कहते हैं वह यही समन्त पंचम तीर्थ है। वामन पुराण में लिखा है कि समन्त पंचक नाम धर्मस्थल चारों ओर पांच-पांच योजन तक फैला हुआ है। सम्भवतः परशुराम द्वारा स्थापित पांचकुण्डों में से एक कुण्ड जाजनपुर का यही स्थल है।

मंगलवार, 23 जून 2009

हरिद्वार से आपके लिए

हरिद्वार का भारतीय में एक विशेष स्थान है | हरिद्वार , काशी , इलाहबाद जैसे तीर्थ स्थान किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं | आज आपके लिए प्रस्तुत हैं हरिद्वार से कुछ छायाचित्र एवं हर की पौड़ी का एक चलचित्र । लीजिए आनंद उठाइए -

पतित पावनी गंगा का एक सुन्दर दृश्य
माता मनसा देवी के मार्ग में एक लंगूर अपने बच्चे को प्रसाद खिलाते हुए
माता मनसा देवी के मंदिर पहुँचाने वाली इलैक्ट्रिक ट्राली
हरिद्वार का एक विहंगम दृश्य
video
हर की पौड़ी पर गंगा प्रवाह

गुरुवार, 18 जून 2009

प्रिय पाठको ,
पिछले कुछ समय से तीर्थों के बारे में आपको जानकारी दे रहा हूं जिसे भविष्य में जारी रखने का मेरा प्रयास रहेगा | इस सन्दर्भ में अपने अनमोल सुझाव दीजिये तथा मुझ अल्पबुद्धि का मार्गदर्शन करें | आपके सेवार्थ एक और ब्लाग बनाया है : www.preranasandesh.blogspot.com

बिन्दुसर एवं बंटेश्वर तीर्थ

हरियाणा कैथल से उत्तर-पूर्व में 16 किलोमीटर की दूरी पर बरोट-बन्दराणा दो गांव स्थित है जिनकी परस्पर दूरी एक से डेढ किलोमीटर है। बिन्दूसर तीर्थ दोनों गांव को एक करता है। इस स्थान पर कर्दम ऋषि ने अपनी पत्नी के साथ पुत्र की इच्छा के लिए तपस्या की थी। जिसे भगवान विष्णु की आंखों से जल बिन्दू गिरे थे। उसी स्थान पर यह सरोवर स्थित है। यहां पर विन्धेश्वरी देवी का पूज्य स्थान भी है। बरोट गांव में बटकेश्वर तीर्थ भी है।जिसे बटूकेश्वर महादेव से जोड़ा जाता है। हालांकि कुछ लोग बरोट का सम्बन्ध महर्षि वशिष्ठ से भी जोड़ते हैं।

बुधवार, 17 जून 2009

कामेश्वर महादेव

गांव रसूलपुर कैथल से उत्तर दिशा में 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां भगवान शिव का विशेष स्थान है। जिसे लोग कामेश्वर महादेव के नाम से जानते हैं। शास्त्रों के अनुसार देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए यही भगवान शिव की आराधना की थी। रसूलपुर की दूसरी खास बात यह भी है कि यह स्थान धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र की 48 कोस की पावन भूमि के पश्चिम में स्थित है ।

हव्य तीर्थ

हरियाणा में कैथल से 27 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व दिशा में पूण्डरी-राजौन्द मार्ग पर भाणा नामक गांव स्थित है। जैसा कि हव्य शब्द से स्पष्ट है कि हव्य अर्थात् हवन की वस्तु। हवन के दौरान अग्नि में दी गई आहुति हव्य कहलाती है। जन-किंवदंतियों के अनसार एक बार इस स्थान पर परमपिता ब्रह्मा ने एक यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें सभी देवी-देवताओ ने भोजन किया था। एक अन्य किंवदंती के अनुसार पाण्ड़वों ने कौरवों पर विजय प्राप्त करने के लिए यहां एक यज्ञ का आयोजन किया था। सूर्य और चंद्र ग्रहण के अवसर पर यहां लोग स्नान करते हैं। हव्य तीर्थ गांव से पूर्व दिशा में 25 एकड़ में फैला हुआ है। दक्षिण पूर्व तट पर एक ऊंचा शिव मन्दिर भी बना हुआ है।

शुक्रवार, 5 जून 2009

रस मंगल तीर्थ (सौंगल)

कैथल से पूर्व-दक्षिण दिशा में 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गांव सौंगल। एक जनश्रुति के अनुसार ब्रह्मा जी ने यहां देवताओं को सोमरस का पान करवाया था। सोमरस प्रदान करने के लिए जिस यज्ञ का आयोजन किया था। वह यज्ञ स्थल आज भी पांच एकड़ भूमि में फैला हुआ है। ऐसा माना गया है कि यहां 6 रसों की उत्त्पति हुई थी। एक अन्य लोकमान्यता के अनुसार वामन भगवान की स्थली है सौंगल। इस तीर्थ के विषय में महाभारत में लिखा है कि -
ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।
तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा वामनम्।

सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णलोकमवानुयात।

(महाभारत वनपर्व 83/103/104)
अर्थात् ‘‘तदन्तर तीनों लोकों में प्रसिद्ध वामन नामक तीर्थ में जाना चाहिए। वहां विष्णुपद में स्नान करके भगवान वामन की आराधना करने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और मुक्त होने पर बैकुण्ठ धाम को चला जाता है।’’

गुरुवार, 28 मई 2009

पवन हृदय तीर्थ (पबनावा)

कैथल से कुरूक्षेत्र मार्ग पर कैथल से उतर दिशा में 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गांव पबनावा। इसे पवन हृदय के नाम से जाना जाता था। पवन हृदय का अर्थ है पवन देवता का हृदय । यहां एक सरोवर है। जिसके पश्चिम किनारे पर पवन देव का मन्दिर है। पवन देव का वाहन हिरण भी उनके चित्र में दिखाया गया है।
इसके इलावा यहां भगवान श्री कृष्ण का मन्दिर भी है। जो शैली की दृष्टि से मथुरा वृन्दावन के मन्दिरों जैसे हैं। इस विषय में वामन पुराण में लिखा गया है कि पवन देव अपने पुत्र श्री हनुमान के शोक में इस सरोवर में लीन हो गए थे। ऐसा माना जाता है कि इस तीर्थ में स्नान करने से और उसके बाद महेश्वर का दर्शन करके मनुष्य पाप विमुक्त हो जाता है। महाभारत के वन पर्व में कहा गया हैः-
पवनस्य हृदे स्नात्वा मरूतां तीर्थमुत्तमम्।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विष्णुलोके महीयते।।

(महाभारत, वनपर्व 83/104/105)
जनधारणा के अनुसार सरोवर में पवन देव के विलीन होने के बाद 49 पवनें भी यहां एकत्र हो गई और पूरे संसार को बिना पवन के सांस लेना असंभव हो गया।तब ऐसी भयंकर परिस्थिति में ब्रह्मा जी के साथ मिलकर सभी देवताओं ने पवन देव से प्रार्थना की। इसके बाद प्रार्थना से प्रसन्न होकर वायु देव प्रकट हुए और संसार में
वायु का प्रवाह आरम्भ हुआ। अतः इसी कारण से इसे पवन हृदय के नाम से माना जाता है।

बाबा राजपुरी (बाबा-लदाना)

हरियाणा के कैथल जिल के पश्चिम की ओर 10 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है।जिसका नाम है- बाबा लदाना इस गांव में मन्दिर एवं समाध हैं जो सांस्कृतिक दृष्टि से हमारी स्वर्णिम विरासत हैं। मन्दिरों के साथ-साथ यहां स्थित समाधों के प्रति लोगों की बड़ी भारी आस्था है। जिनमें प्रमुख है:- बाबा राजपुरी की समाध। यहां के निवासियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार 400 वर्ष पूर्व बाबा राजपुरी ने यहां जीवित अवस्था में समाधि ले ली थी। इसी तरह यहां पर छोटी बड़ी 33 समाधियां हैं। इनके पास एक जाल का वृक्ष है। जो इन समाधियों से भी पुराना माना जाता है। इसके पास ही एक शिव मन्दिर भी है। दशहरे के अवसर पर यहां बड़ा भारी मेला लगता है। जिसमें हरियाणा पंजाब, राजस्थान, दिल्ली आदि के लोग शामिल होते हैं। यहां समाधि स्थल के नाम 70 एकड़ भूमि है। समाधि स्थल पर एक वर्गाकार सरोवर भी बना है।

शनिवार, 23 मई 2009

पूण्डरीक तीर्थ पूण्डरी

भक्त शिरोमणि पूण्डरीक का नाम आपने सुना होगा। उन्हीं के नाम से बना है पूण्डरी। यह तीर्थ स्थान पूर्व दिशा में कैथल से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
लोक किंवदन्तियों के अनुसार भक्त पूण्डरीक तपस्या करते करते भगवान के अंश में मिल गए थे। अन्त में उनका निष्पाप शरीर श्याम वर्ण का हो गया तथा 4 भुजाएं और हाथ में शंख, चक्र, गदा और पदम् आ गए थे। स्वयमेव उनके वस्त्र पीले रंग के हो गए और मुख मण्डल तेज से चमकने लगा। जिससे उन्हें पूण्डरीकाक्ष कहा गया तथा भगवान विष्णु उन्हें अपने साथ अपने वाहन गरूड़ पर बैठाकर वैकुण्ठधाम ले गए। शास्त्रों के अनुसार इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने अपने नाभी कमल से ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया तथा संसार की उत्पति की। इसके विषय में महाभारत के वनपर्व और वामन पुराण में भी उल्लेख है-
शुक्लपक्षे दशम्यां च पुण्डरीकं समाविशेत्।
तत्र सनात्वा नरो राजन्पुण्डरीकफलं लभेत्।।
(महाभारत, वन पर्व 83/85/86)
पौण्डरीके नरः स्नात्वा पुण्डरीकफलं लभेत् ।
दशम्यां शुक्लपक्षस्य चैत्रस्य त विशेषतः।
स्नानं जपं तथा श्राद्धं मुक्तिमार्गप्रदायकम्।।
(वामन पुराण 36/39-40)
इस महान तीर्थ पर सिद्ध बाबा दण्डीपुरी, ग्यारहरूद्री महादेव का छोटा-सा तालाब युक्त मन्दिर, गीता भवन आदि स्थित हैं।

अरन्तुक यक्ष स्थल-बहर

पंजाब और हरियाणा दोनों का मिला-जुला सांस्कृतिक स्थान है-बहर। यह पटियाला से 40 किलोमीटर और कैथल से उतर पश्चिम में 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
कुरूक्षेत्र की 48 कोस की पवित्र भूमि के चारों दिशाओं में 4 यक्ष बताए गए हैं। जिनमें से अरन्तुक यक्ष एक है। जो बहर में स्थित माना जाता है । निर्धारित चारों द्वारपालों में से इसका अधिक महत्व माना गया है। द्वारपालों को तरन्तुक, अरन्तुक, रामह्रद तथा मचक्रुक यक्ष के नाम से जाना जाता है। इसका वर्णन महाभारत के वनपर्व तथा शल्यपर्व में किया गया है:-
तरंतुकारंतुकयोः यदंतरंरामहृदानां च मचक्रुकस्य च ।
एतत् कुरूक्षेत्रसमंतपंचकं पितामहस्योत्तरवेदिरूच्यते।।

(महाभारत,वन पर्व 83/208 शल्य पर्व, 53/24)
जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में वर्णन है तद्नुसार अरन्तुक यक्ष बहर में स्थित है। यक्ष शब्द से कुबेर का अर्थ लिया जाता है। क्योंकि कुबेर धन के देवता है। इसलिए ऐसा माना गया है कि ये चारों यक्ष भी द्वारापालों के समान इस क्षेत्र की सख और समृद्वि के यह रक्षक है। इस स्थान परस्नान करने से मानव को अग्निष्टोम का फल प्राप्त होता है।
बहर नामक गांव में उतर पश्चिम में स्थापित पूर्ण परिसर में कई देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। जिनमें से भगवान विष्णु की मध्यकालीन प्रतिमा विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।यह मूर्ति बालुका पत्थर से बनाई गई है। चैत्र अमावस्या के दिन यहां विशाल मेले का आयोजन होता है। जिसमें हरियाणा और पंजाब के लोग बढ-चढ़ कर भाग लेते हैं। ऐसा माना गया है कि इन दिनों यहां सरस्वती का वास होता है।

श्रंगी,मार्कण्डेय एवं शकुदेव मुनि स्थल

श्रंगी ऋषि स्थल(सांघण):-
कैथल से पश्चिम की ओर 16 किलोमीटर दूर है गांव सांघण । जहां श्रृगी ऋषि का छोटा सा मन्दिर सरोवर के किनारे बना है। इसके अतिरिक्त एक शिव और दूसरा गणेश मंदिर भी है।
श्रृंगी स्थल परिसर में अब बाबा राम नेत्र त्यागी द्वारा एक मुख्य द्वार बनवाया गया है। प्रत्येक रविवार को श्रृंगी ऋषि के दर्शन के लिए लोग आते हैं। यहां 25 एकड़ में फैला एक विशाल सरोवर भी है।श्रृंगी ऋषि द्वारा युग में दशरथ के लिए शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया गया था। यज्ञ के प्रभाव से राजा दशरथ को 4 पुत्र राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न हुए थे। द्वापर युग में श्रृंगी के पिता शमीक के गले में राजा परीक्षित ने मरा हुआ सांप डाल दिया था, जिससे क्रोधित होते हुए श्रृंगी ऋषि ने राजा परीक्षित को श्राप देते हुए कहा, ‘‘कुलांगर परीक्षित ने मेरे पिता का अपमान करके मर्यादा का उल्लंघन किया है, इसलिए मेरी प्रेरणा से आज के सातवें दिन उसे तक्षक सर्प डस लेगा।’’ कुछ लोग महाभारत में वर्णित शंखिनी के नाम से भी सांघन का नाम जोड़ते हैं।
मार्कण्डेय ऋषि स्थल है (मटोर) :-
कैथल से 30 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित है-मटोर। यह स्थल मार्कण्डेय की जन्म भूमि माना जाता है।जनश्रुति के अनुसार पुत्र प्राप्ति हेतु उनकी माता और पिता मृकण्डु ने भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु तपस्या की थी। शिव कृपा से उन्हें मार्कण्डेय पुत्र रूप में प्राप्त हुए लेकिन अनकी आयु मात्र सोलह वर्ष थी। मार्कण्डेय शिव भक्त थे। 16 वर्ष की आयु में मृत्यु को आया देख ये शिवलिंग से लिपट गये और यमराज को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। मार्कण्डेय अमर होकर तपस्या करने पहाड़ों में चले गए। मार्कण्डेय के जन्म स्थल पर लगभग 3 एकड़ में एक सरोवर गना है। जहां सूर्य ग्रहण के अवसर पर एक मेला लगता है।
शकुदेव मुनि का स्थल है (सजूमा) :-
कैथल से दक्षिण पश्चिम की ओर 10 मिलोमीटर दूर है-सजूमा। यहां 20 एकड़ में फैला हुए एक सरोवर है जिसे सूर्य कुण्ड कहते हैं। सूर्य कुण्ड के नाम से ही सजूमा प्रसिद्ध तीर्थों की गणना में आता है। एक जनश्रुति के अनुसार महर्षि व्यास के पुत्र भगवान शुकदेव जी ने यहां तपस्या की थी। उनका वेश अवधूत का था। भाद्रपद मास में यहां मेला लगता है। मुनि शुकदेव की प्रतिमा नीचे एक गुफा में है। प्रतिमा तक जाने के लिए लगभग 70 फुट गुफा में होकर जाना पड़ता है।

कपिल मुनि तीर्थ (कलायत)

हरियाणा के जनपद कैथल से नवारना-हिसार मार्ग पर कैथल से 25 किलोमीटर की दूरी पर कलायत गांव स्थित है। जिसका सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत महत्त्व है। यहां कपिल मुनि नाम से एक प्रसिद्ध तीर्थ है। जिसका शास्त्रों में भी उल्लेख किया गया है। यहां कपिल अवतार की मूर्ति है तथा साथ में एक तीर्थ है। जिसे कपिल मुनि तीर्थ का नाम दिया गया है। इस तीर्थ के किनारे कात्यायनी मन्दिर, श्री लक्ष्मी नारायण मन्दिर स्थित हैं। इनके अतिरिक्त लगभग 7 वीं शताब्दी में पंचरथ शैली में बना हुआ एक शिव मन्दिर है।जहां प्रत्येक महीने की पूर्णिमा को एवं विशेष रूप से वर्ष में एक बार कार्तिक मास में पूर्णिमा के दिन मेला लगता है। ऐसी मान्यता है कि परमपिता ब्रह्मा के मानस पुत्र कर्दम ऋषि और महाराज मनु की पुत्री देवहुति की 9 कन्याओं के बाद अवतार के रूप में कपिल का दसवें स्थान पर जन्म हुआ था। भागवत के अनुसार तत्त्वों की गणना करने वाले भगवान कपिल लोगों कों आत्मज्ञान का उपदेश देने के लिए स्वयमेव उत्पन्न हुए। इनके द्वारा विरचित ‘तत्त्व समास’ नामक ग्रंथ में सांख्य के 25 तत्त्वों का उल्लेख किया गया है और तत्वों की संख्या के परिगणन के कारण ही यह शास्त्र सांख्य दर्शन कहलाता है।
कपिल मुनि तीर्थ के बारे में एक और किंवदन्ती प्रसिद्ध है जिसमें कहा जाता है कि राजा शल्यवान रात में मृतक के समान हो जाते थे और सुबह वह ठीक हो जाते थे। एक बार शिकार के समय अनजाने में कपिल मुनि तीर्थ में तीर मार बैठे। जब वह इस तीर को निकालने लगे तो उसका हाथ कपिल मुनि तीर्थ की मिट्टी से छू गया। जिससे उनके हाथ की वह अंगुलियां रात भर सक्रिय रहीं जो मिट्टी से छू गई थी। इससे प्रभावित होकर राजा और रानी ने अगले दिन इस तीर्थ में स्नान किया जिससे वह स्वस्थ हो गए।
इसी वजह से राजा शल्यवान ने यहां मन्दिरों का निर्माण करवाया था। उनके समय की एक चौखट आज भी विद्यमान है।

शुक्रवार, 22 मई 2009

कैथल के प्रसिद्ध तीर्थ-स्थान

कुरुक्षेत्र के पावन ४८ कोश क्षेत्र में स्थित कैथल में भी कुछ तीर्थ प्राप्त होते हैं । इसके प्रसिद्ध तीर्थ निम्नलिखित हैं जिनके महत्त्व पर प्रकाश डाला जा रहा है -
वृद्धकेदार तीर्थ स्थल:-
कैथल से उत्तर पूर्व में स्थित इस तीर्थ का बहुत महत्व है। इसके एक ओर पार्क झील के रूप में इसे विकसित किया गया है तथा इसका दूसरा रूप अभी तक उपेक्षित है। वामन पुराण में बताया गया है कि अगर कोई व्यक्ति इस स्थान पर तर्पण करके भगवान शिव को प्रणाम करने के बाद तीन चल्लू पानी पिता है, वह केदार तीर्थ पर जाने का फल प्राप्त कर लेता है -
कपिलस्थेति विख्यातं सर्वपातकनाशनम्।
यस्मिन् स्थितः स्वयं देवो वृद्धकेदारसंज्ञितः ।
(वामन पुराण, 36/14)
एवमेव-कपिष्ठलस्य केदारं समासाद्य सुदुर्लभम् ।
अन्तर्धानमवाप्नोति तपसा दग्धकिल्विषम् ।।
(महाभारत, वन पर्व 83/74)
यहां एक शिव मन्दिर बना हुआ है जो अष्टकोणीय है। यहां बने सरोवर की बुजियां भी अष्टकोणीय आकार लिए हैं। वामन पुराण में ऐसा भी कहा गया है कि कपिस्थल नामक तीर्थ में वृद्ध केदार नामक भगवान स्वयं विराजमान हैं।
ग्यारह रूद्री मन्दिर:-
कैथल के ही पश्चिम में महाभारत काल से एक प्रसिद्ध मंदिर है ग्यारह रूद्री । आज यह मन्दिर पूर्णतया आधुनिक रूप से विकसित किया जा चुका है। जिसका प्रवेश द्वार बहुत ही सुन्दर दिखाई पड़ता है। इस मन्दिर में ग्यारह रूद्रों की स्थापना की गई है। जिनके विषय में महाभारत में वर्णित उल्लेख के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र जो महान ऋषि थे मृगव्याध, सूर्प, निऋति, विनाकी, अहिवुथ, अजैकपाद दहन, ईश्वर, कपाली, स्थाणु और भव। महाभारत में लिखा है:-
एकादशसुताः स्थाणोः ख्याताः परमतेजसः।
मृगव्याधश्चसर्पश्च निऋतिश्चमहायशाः।
अजैकपादहिर्बुधन्यः पिनाकी च परंतप।
दहनोथेश्वरश्चैव कपाली च महाधुनिः।
स्थाणुर्मगश्च भगवान् रूद्रा एकादशस्मृताः।
(महाभारत, आदि पर्व 66/1-3)
ये एकादश ही रूद्रों के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं। इस मन्दिर में जलहरी में ग्यारह रूद्र स्थापित किए गए हैं। मन्दिर के दक्षिण में सर्वदेव नामक तीर्थ है। जिसे सकलसर भी कहा गया है।

गुरुवार, 21 मई 2009

पाठकों से

पिछले कुछ सन्देशों में कविता-कहानी से हटकर आपके लिए तीर्थ-स्थानों से संबंधित लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसी श्रेणी में हम कुरुक्षेत्र में स्थित तीर्थों की बात कर चुके हैं तथा कैथल के भी एक तीर्थ-स्थान के बारे में लिखा जा चुका हैं । अब जल्द ही कैथल और कैथल के आसपास के तीर्थों के बारे में आपको जानकारी प्रदान करना हमारा लक्ष्य रहेगा ।



मंगलवार, 12 मई 2009

कुरूक्षेत्र के प्रमुख तीर्थ

धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र की 48 कोश की पावन धरा पर स्थित तीर्थों का वर्णन आप पिछले 3-4 लेखों से पढ रहे हैं । इसी श्रेणी में हम यह लेख प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें आप कुरूक्षेत्र नगर में स्थित प्रमुख तीर्थों के बारे में पढेंगे तथा शीर्षक रहेगा '' कुरूक्षेत्र के प्रमुख तीर्थ '' । लीजिए प्रस्तुत है -
ब्रह्म सरोवर (कुरूक्षेत्र):-
कुरूक्षेत्र के जिन स्थानों की प्रसिद्धि संपूर्ण विश्व में फैली हई है उनमें ब्रह्मसरावर सबसे प्रमुख है। इस तीर्थ के विषय में विभिन्न प्रकार की किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। अगर उनकी बात हम न भी करें तो भी इस तीर्थ के विषय में महाभारत तथा वामन पुराण में भी उल्लेख मिलता है। जिसमें इस तीर्थ को परमपिता ब्रह्म जी से जोड़ा गया है । सूर्यग्रहण के अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर लाखों लोग ब्रह्मसरोवर में स्नान करते हैं। कई एकड़ में फैला हुआ यह तीर्थ वर्तमान में बहुत सुदंर एवं सुसज्जित बना दिया गया है। कुरूक्षेत्र विकास बोर्ड के द्वारा बहुत दर्शनीय रूप प्रदान किया गया है तथा रात्रि में प्रकाश की भी व्यवस्था की गयी है।
स्थानेश्वर महादेव मंदिर (कुरूक्षेत्र):-
स्थानेश्वर महादेव मंदिर का नाम कुरूक्षेत्र के मन्दिरों में आदर के साथ लिया जाता है इसके आधार पर ही यहां का नाम थानेसर पड़ा है। यहां पर शिवरात्रि के अवसर पर मेला आयोजित होता है।भगवान शिव यह भव्य मंदिर रात को विद्युत प्रकाश में जगमगाता रहता है। शिवरात्रि के अवसर पर इसकी छटा देखते ही बनती है।
सन्निहित सरोवर (कुरूक्षेत्र) -
कुरूक्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ-स्थानों में सन्निहित सरोवर भी बहुत महत्व रखता है।कुरूक्षेत्र में कैथल मार्ग पर श्री कृष्ण संग्रहालय के पास स्थित है तथा मुख्य मार्ग पर इसका विशाल द्वार बना है। कहा जाता है कि यहां पर युद्ध के बाद पांडवों ने सभी दिवंगतों की मुक्ति के लिए पिंड-दान आदि कार्य किया था। यहां एक विशाल सरोवर का निर्माण किया गया है; जिसके चारों ओर रात्रि के लिए प्रकाश व्यवस्था भी की गई है।
यहां सभी देवी-देवताओं के मंदिर स्थित हैं। जिनमें इसके पास ही में स्थित प्राचीन लक्ष्मी-नारायण मंदिर प्रमुख है।अन्य सभी मंदिर सरोवरके आस-पास बने हुए हैं और तीर्थ की शोभा बढ़ाते हैं।
बाण गंगा (कुरू़क्षेत्र):-
कुरूक्षेत्र से पेहवा मार्ग पर ज्योतिसर से कुछ पहले ही मुख्य मार्ग से जुड़ा हुआ एक मार्ग हमें दयालपुरा गांव ले जाता है जहां स्थित है- बाण-गंगा। इसके बारे में अनुमान लगाया जाता है कि यहां शर-शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह को प्यास लगने पर अर्जून ने अपने बाण द्वारा धरती से जल निकाल कर पिलाया था। वर्तमान समय अर्जुन के बाण लगने वाले स्थान पर एक कुएं का निर्माण किया गया है तथा हनुमान जी की विशाल प्रतिभा के साथ-साथ यहां शर-शैय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह की मूर्ति है।
भद्रकाली शक्तिपीठ (कुरूक्षेत्र):-
कुरूक्षेत्र में स्थित श्री देवीकूप (भद्रकाली) मंदिर मां सती के बावन शक्तिपीठों में शोभायमान है।
शास्त्रानुसार दक्ष-यज्ञ में अपने पति भगवान शंकर की निन्दा व अपमान देख-सुनकर भगवती सती ने अपने प्राणों को त्याग दिया। भगवान शिव उनके शव को हृदय से लगाए उन्मत की भांति ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से महाशक्ति के निवास स्थान मृत शरीर को बावन भागों में विभाजित कर लोग कल्याण के लिए पावन शक्तिपीठों के रूप में प्रतिष्ठित किया। नैना देवी, कामाख्या देवी, ज्वाला जी इत्यादि सभी बावन शक्तिपीठ मां के प्रिय निवास स्थल हैं।
हरियाणा में एक मात्र शक्तिपीठ श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर है। जिसका बहुत महत्व है। इस मन्दिर में रखा सती जी का दायां टकना बार-बार इतिहास का दोहराता है। इस शक्ति पीठ में महाभारत के युद्ध से पूर्व पांडवों ने विजय के लिए मां भद्रकाली का पूजन किया था। श्री कृष्ण और बलराम का मुण्डन संस्कार भी इसी मन्दिर में हुआ। इस मन्दिर में आने वाले हर श्रद्धालु की मनोकामना मां भद्रकाली पूरी करती है।जिससे मनोकामना पूर्ण होने के बाद भेंट स्वरूप यथा शक्ति सोने-चांदी के अथवा मिट्टी के घोडे़ चढ़ाने की ऐतिहासिक परम्परा है। नवरात्रों के अतिरिक्त शनिवार के दिन यहां विशेष रूप से पूजन होता है।
गीताजन्म स्थली (ज्योतिसर) कुरूक्षेत्र :-
संपूर्ण विश्व में भारत श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान के लिए प्रसिद्ध है। गीता का ज्ञान आध्यात्मिक क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।  इस विषय में कोई भी जानकारी सुनने, पढने वाले के लिए कौतूहल का विषय होगी। यह गीता ज्ञान भगवान श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को उस समय दिया जब वह मोहवश कौरवों से युद्ध करने से मना कर देता है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि कौरव-पाण्डव युद्ध कुरूक्षेत्र की भूमि पर हुआ था। उसी के पास 4 कि0 मी0 दूरी पर स्थित ज्योतिसर नामक स्थान पर अर्जुन को गीता का उपदेश दिया गया।
यहां आज भी एक वृक्ष है जिसे गीता-ज्ञान का साक्षी माना जाता है। इसके पास ही एक ऐसा शिवलिंग है जिस पर कई प्रकार के प्रहारों के चिह्न भी हैं।
जिससे अनुमान लगाया जाता है कि यह भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों के दौरान शत्रुओं के द्वारा किया गया कार्य है।इसके अतिरिक्त महाभारत से संबंधित अनेक चित्रों की झांकी भी यहां प्रदर्शित है। ज्योतिसर को सुदंरता और पर्यटन में अहम् स्थान प्रदान करने के लिए एक कृत्रिम झील का निर्माण भी यहां कुरूक्षेत्र विकास बोर्ड द्वारा किया गया है।

धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र

हमारा भारत कश्मीर से कन्याकुमारी और कामाख्या से कच्छ तक एक तीर्थ है। यहां कोई ऐसी क्षेत्र नहीं जहां कोई पावन सरिता, पवित्र सरोवर, तीर्थभूत पर्वत, लोकपावन सरिता, मन्दिर या तीर्थभूमि न हो। यहां तो सब कहीं तीर्थ हैं। एक-एक तीर्थ में शत-शत तीर्थ हैं। भारत भूमि देवताओं के लिए भी दुर्लभ है तथा देवताओं के द्वारा भी इसकी वंदना की जाती है। इस देवधरा पर कितने तीर्थ हैं इसकी गणना करना संभव नहीहै। हालांकि इस विषय में थोड़ी-सी चर्चा यहां अवश्य करेंगे। भारत के प्रसिद्व तीर्थों में जिनका नाम आता है उनमें द्वादश ज्योतिल्र्लिग, पंचकाशी, पंचनाथ, पंचसरोवर, नौ अरण्यक, चतुर्दश प्रयाग, सप्तक्षेत्र, सप्तगंगा, सप्तपुण्य नदियां सिद्वक्षेत्र (इक्यावन), बावन शक्तिपीठ, सप्त सरस्वती, सप्तपुरियां,चार धाम आदि जाने कितने ऐसे तीर्थ स्थान हैं। जो अपने-अपने महत्व के कारण जगत प्रसिद्व हैं। इन सब में एक ऐसा तीर्थ स्थान है जिसका कुछ विशेष महत्व है और वह है कुरूक्षेत्र। कुरूक्षेत्र एक ऐसा तीर्थ स्थान है जिसकी गणना सप्तक्षेत्र, बावन शक्तिपीठ, सप्त सरस्वती इक्यावन सिद्वक्षेत्र आदि सभी में समान रूप से की गई है।
संसार के जिन स्थानों पर सबसे पहले मानव सभ्यता का विकास हुआ, उनमें धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र का नाम अग्रगण्य है। सरस्वती एवं दृषद्वती जैसी पवित्र नदियों की इस धरा पर वैदिक सभ्यता का उद्भव हुआ। भारतीय धर्म, दर्शन, कला, साहित्य आदि के विकास में प्रथम सृजन यहीं हुआ। कृष्ण यजुर्वेद की मैत्रायणी शाखा में कुरूक्षेत्र का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद से प्राप्त जानकारी के अनुसार आर्यों की प्रमुख जातियां भरत एवं पुरू भी इसी पावन धरा से जुड़े रही हैं। जिनके सम्मिश्रण से कुरू नामक जाति का आविर्भाव हुआ। इसलिए ही इसे कुरूक्षेत्र कहा गया है । कुरूक्षेत्र यानि कुरूओं का क्षेत्र। प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार महाराज कुरू ने 48 कोस कुरूक्षेत्र भूमि पर सोने का हल चलाया तथा धर्म का बीज बोया। कहा जाता है कि एक बार जब पृथ्वी पर अनाचार बहुत बढ़ गया। प्राणियों की दुर्दशा से दुःखी देवता बुद्धि के देवता परमपिता ब्रह्मा के पास पहुंचे। जब उन्होंने अपनी समस्या बताई तो वे बोले-इस समय धरती पर धर्म उत्थान के लिए एक ही उपाय है। सभी देवता एक साथ बोले- क्या उपाय है परमपिता शीघ्र बताइए?
इस पर ब्रह्मा जी ने कहा-हे देवताओं, आप इतने उत्सुक हैं तो ध्यान से सुनो-महाराज कुरू एक प्रतापी तथा धर्म व नीति से राज्य करने वाले राजा हैं।अगर वह अपने शरीर के टुकड़े कर बोने को तैयार हो जाएं तो जहां-जहां उनके शरीर के टुकड़े रोपित होंगे, वहां से धर्म का उत्थान होगा।अतः आप उनके पास जाइए और इसके लिए उनसे प्रार्थना कीजिए तथा श्री विष्णु की भी इस पावन कार्य में आप मदद ले सकते हैं।
तदनन्तर देवगण महाराजा कुरू के पास पहुंचे और उनसे ब्रह्मा जी के कथनानुसार अनुरोध किया। जब राजन् से देवों ने पृथ्वी के उत्थान की बात सुनी तो उन्होंने वह अनुरोध सहर्ष स्वीकार कर लिया। फिर सही समय पर भगवान श्री विष्णु के सुदर्शन चक्र से कुरू के शरीर के टुकडों में बांटकर कुरूक्षेत्र के पास के 48 कोस क्षेत्र में उनके द्वारा स्वयं हल चलाकर बोया गया। जब अंतिम टुकड़ को बोया जाने लगा तो भगवान नारायण ने उन्हें वर मांगने के लिए कहा। जिस पर महाराजा कुरू ने कहा कि प्रभु मुझे वर दीजिए कि भविष्य में जब कभी धर्म-अधर्म में युद्ध हो तो इसी भूमि पर हो।
ऐसा सुनकर प्रभु ने कहा -तथास्तु। तभी से यह पुण्य भूमि कुरूक्षेत्र के नाम से विख्यात है और यही कारण यहाँ धर्मयुद्ध महाभारत होने की पृष्ठभूमि भी रहा है। इसके अतिरिक्त दंत कथाओं, किंवदंतियो, जनश्रुतियों इत्यादि में भी इस बात की पुष्टि होती है। इस संबंध में कथाएं, प्रसंग एवं आख्यान प्रचलित हैं तथा उनका विशद विवरण भी प्राप्त होता है। यहां स्थित श्रयणावत सरोवर के पास इंद्र को महर्षि दधीचि से अस्थियों की प्राप्ति, पुरूरवा और उर्वशी का पुनर्मिलन, परशुराम द्वारा आततायी क्षत्रियों के खून से पांच कुण्ड भरने का वर्णन, वामन अवतार जैसे कई आख्यान लोक प्रचलित हैं।
महाभारत के युद्ध की रणस्थली तथा श्री मद्भगवतगीता के अद्वितीय उपदेश का पवित्र स्थल कुरूक्षेत्र एक ऐतिहासिक स्थान है। तैत्तिरीय आरण्यक में वर्णित इसके भौगोलिक रूप को देखने पर पता चलता है कि यह क्षेत्र सरस्वती, दृषद्वती, आपगा से परिबद्ध था। तैत्तिरीय आरण्यक के अनुसार इसके दक्षिण में खाण्डवप्रस्थ अर्थात् इंद्रप्रस्थ, पश्चिम भाग में मरूभूमि है।
महाभारत और वामन पुराण के अनुसार सरस्वती और दृषद्वती के मध्य की भूमि कुरूक्षेत्र कहलाती थी। जिसके चारों कोनों में चार यक्ष (द्वारपाल) प्रतिष्ठित थे। यहां 360 तीर्थों के होने की चर्चा है। ये सभी तीर्थ पौराणिक दृष्टि से सत्युग, त्रेतायुग, द्वापर युग एवं ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत के पूर्ववर्ती व परवर्ती काल से संबंधित हैं।
इस प्रकार से यहा सारी 48 कोस कुरूक्षेत्र भूमि हरियाणा के कुरूक्षेत्र, कैथल, करनाल, जीन्द एवं पानीपत जिलों में फैली हुई है।महाभारतानुसार उत्तर-पूर्व में रंतुक यक्ष (बीड़ पीपली के पास) पश्चिम में अरंतुक यक्ष (कैथल में बेहर गांव के पास) दक्षिण-पश्चिम में रामहृद यक्ष (जिला जीन्द में रामराय के पास) एवं दक्षिण पूर्व में मचक्रुक यक्ष (जिला पानीपत में शींख के पास) का स्पष्ट वर्णन मिलता है। इस प्रकार इन चार यक्षों द्वारा रक्षित इस आयताकार 48 कोस की भूमि में 360 तीर्थों की उपस्थिति मानी जाती है।
यहाँ के एक प्रसिद्ध लोक कवि ‘साधुराम’ की रचना के अनुसार यहां 9 नदियां 366 गाँव, 4 यक्ष, 33 करोड़ देवी-देवता, नाथ तथा 84 सिद्धों का निवास है।
कुरूक्षेत्र के पावन भूमि पर स्थित प्रमुख तीर्थों में ब्रह्मसरोवर, सन्निहित सरोवर, ज्योतिसर, पेहवा का पृथूदक तीर्थ, स्थानेश्वर महादेव मंदिर, भ्रद्रकाली मंदिर, रामहृद तीर्थ, सालवन तीर्थ, कपिलमुनि तीर्थ, वराह तीर्थ, आपगा तीर्थ ,सारसा का शालिहोत्र तीर्थ, बस्थली का व्यास स्थली तीर्थ, फरल (फलकीवन) स्थित फल्गु व पणिश्वर तीर्थ, भूरिश्रवा तीर्थ (भौर सैंदा), आदि अनेक प्रमुख तीर्थ हैं।
सप्तक्षेत्र, बावन शक्तिपीठ, सप्त सरस्वती, सिद्धक्षेत्र (इक्यावन) आदि में शामिल कुरूक्षेत्र की इस 48 कोस की पावन धारा पर स्थित हर गांव का संबंध किसी न किसी रूप में संस्कृति या सभ्यता से जुड़ा है।
वामन पुराण में कुरूक्षेत्र भूमि में स्थित सात वनों का स्पष्ट नामोल्लेख मिलता है। जैसे - काम्यक वन, अदिति वन, व्यास वन, फलकीवन, सूर्यवन वन, मधुवन तथा शीतवन । वामन पुराण के अनुसार इन पुण्यशाली वनों के नाम का उच्चारण करते ही मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं:-
श्रृणु सप्त वनानीह कुरूक्षेत्रस्य मध्यतः।
येषां नामानि पुण्यानि सर्वपापहराणि च।
काम्यकं वनं पुण्यं दितिवनं महत्।
व्यासस्य वनं पुण्यं फलकीवनमेव
तथा सूर्यवनस्थानं तथा मधुवनं महत्।
पुण्यं
शीतवनं नाम सर्वकल्मषनाशनम्
(वामन पुराण-34/3-5)
शास्त्रों के अनुसार सप्त सरस्वतियों में से एक ओघवती सरस्वती कुरूक्षेत्र में प्रवाहित होती है। इस विषय में प्राप्त शास्त्रोक्त जानकारी के अनुसार यहां सरस्वती प्रवाहित होती है। जिसका स्वरूप अब बदल चुका है। इसमें वर्षा ऋतु में ही पानी दिखाई देता है। सरस्वती के बारे में जो जानकारी हमें प्राप्त होती है तदनुसार पता चलता है कि सरस्वती सम्पूर्ण नदियों में श्रेष्ठ एवं पाप नाशक नदी है तथा ब्रह्मलोक से आई है।
सरस्वती सर्वप्रथम अपने जलावेग से पर्वतों को तोड़ती द्वैत वन में प्रविष्ट होती है। जहां महर्षि मार्कण्डेय उनके दर्शन करते हैं तथा उनसे कहते हैं कि हे सरस्वती! ब्रह्मसर, रामहृद, कुरूक्षेत्र, पृथूद्क (पिहोवा) में चलना योग्य है। ऐसा सुनकर सरस्वती वेग के साथ कुरूक्षेत्र पृथूद्क में प्रवेश करती है। पर कुछ किवंदंतियों के अनुसार जब मार्कण्डेय को सरस्वती के दर्शन होते हैं। उनसे विवाह का प्रस्ताव रखते हैं।
जिससे देवी रूष्ट होकर सर्प पर सवार होकर पेहवा से बानपुरा, कक्योर, पोलड़, सौथा, उमेदपुर, प्रभोत, घोघ, अन्घली से होती हुई साहब तक तीव्र गति से सांप की तरह टेढ़ी-मेढ़ी चलती हैं। वहीं मार्कण्डेय उन्हें मनाने के लिए उनके पीछे सीधा चलता है। लेकिन जब सरस्वती को यह अहसास होता है तो वह सर्प सवारी को छोड़कर हंस पर सवार होती हैं और डहर तक जाती है।
जब उन्हें मार्कण्डेय समीप प्रतीत होते है तो वह डूबकी लगाती हैं और प्रयागराज में प्रकट होती है। तब मार्कण्डेय भी योग साधना द्वारा प्रयाग में प्रकट होते हैं। जहां सरस्वती गंगा और यमुना के बीच से चलती है। ऐसे में जब मार्कण्डेय अपने मन की बात उन तीनों के सामने प्रस्तुत करते हैं तो वे बताती है कि हम तीनों ब्रह्मा की पुत्रियां हैं। हम एक साथ विवाह करेंगी अथवा कुंवारी रहेंगी। मार्कण्डेय जी ने कोई उत्तर नहीं दिया और तपस्या करने के लिए वन में चले गए।
तभी से सरस्वती त्रिवेणी रूप में प्रवाहित हो रही है। सरस्वती वास्तविकता में नदी नहीं वरन् उसे विद्या की देवी है जो समंदर में समाहित नहीं होती। अतः यह कुमारिका नदी भी कहलाती है।
मनुस्मृति के अनुसार देवनदी सरस्वती एवं दृषद्वती फल्गु में है। इन दोनों के मध्य जो स्थान है उसे ब्रह्मवर्त कहा जाता है। जहां ब्रह्मा ने यज्ञ किया था।
महाभारत के अनुसार ब्रह्मपुराण, स्कंद पुराण, शिवपुराण, भागवत पुराण, मार्कण्डेय पुराण आदि में तीस सरस्वती नदियों का वर्णन मिलता हैं। यथा-सुप्रभा नामक सरस्वती पुष्कर में, कांचनाक्षी सरस्वती नैमिषारण्य में ,प्रयाग सरस्वती गया में, उत्तरकौशल में मनोरमा सरस्वती तथा कुरूक्षेत्र में सुरेणु सरस्वती (ओघवती सरस्वती) जो दृषद्वती में मिल गई है तथा हिमालय की विमलोद सरस्वती जिसे श्री मद्भागवत में प्राची भागवत भी कहा गया है। यहां सातों सरस्वती इकट्ठी होने के कारण इसे सप्त सारस्वत तीर्थ की संज्ञा दी गयी है। दूसरा सप्त सारस्वत तीर्थ भी कुरूक्षेत्र की सीमा में ही विद्यमान है; जहां मंकणक मुनि को सिद्धि प्राप्त हुई थी। मंकणक मुनि के नाम से मांगणा नामक गांव में प्रसिद्ध तीर्थ है; यहां से सरस्वती जिला कैथल में प्रवेश करती है।जो वर्तमान में पूरे कुरुक्षेत्र के भू-भाग को पुलकित करती हुई बहती है ।निःसन्देह कहा जा सकता है कि कुरुक्षेत्र एक पवित्र धरा है जो हरियाणा ही नहीं वरन सम्पूर्ण भारत के लिए विरासत है।

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