नव हर्ष मिले
उत्कर्ष मिले
जीवन रुपी संघर्ष में
मंजिल का स्नेहिल
स्पर्श मिले
रहो अर्श पर
हमेशा
ऐसा हर पल
हर आने वाला वर्ष मिले ।
वादा किया वो कोई और था, वोट मांगने वाला कोई और
1 हफ़्ते पहले
"वसुधैव कुटुम्बकम्" की परिकल्पना
नव हर्ष मिले
उत्कर्ष मिले
जीवन रुपी संघर्ष में
मंजिल का स्नेहिल
स्पर्श मिले
रहो अर्श पर
हमेशा
ऐसा हर पल
हर आने वाला वर्ष मिले ।
प्रस्तुतकर्ता दिनेश शर्मा पर 12:06 pm 0 टिप्पणियाँ
मेरी आँखों में
समाये हो तुम
मेरी सांसों में
बसे हो तुम
मेरा तन
मेरे प्राण हो तुम
मेरी स्तुति
मेरे स्तुत्य हो तुम
मेरी प्रेरणा
मेरा प्रण हो तुम
मेरी साधना
मेरा साहित्य हो तुम
ए-मेरे वतन
मेरी शान हो तुम
मैं अनजान हूँ यहाँ
मेरी पह्चान हो तुम
गर्व से कहता हूँ
मैं हिन्दुस्तानी
हिन्दुस्तान हो तुम ll
प्रस्तुतकर्ता दिनेश शर्मा पर 7:18 pm 1 टिप्पणियाँ
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