गुरुवार, 18 जून 2009

प्रिय पाठको ,
पिछले कुछ समय से तीर्थों के बारे में आपको जानकारी दे रहा हूं जिसे भविष्य में जारी रखने का मेरा प्रयास रहेगा | इस सन्दर्भ में अपने अनमोल सुझाव दीजिये तथा मुझ अल्पबुद्धि का मार्गदर्शन करें | आपके सेवार्थ एक और ब्लाग बनाया है : www.preranasandesh.blogspot.com

बिन्दुसर एवं बंटेश्वर तीर्थ

हरियाणा कैथल से उत्तर-पूर्व में 16 किलोमीटर की दूरी पर बरोट-बन्दराणा दो गांव स्थित है जिनकी परस्पर दूरी एक से डेढ किलोमीटर है। बिन्दूसर तीर्थ दोनों गांव को एक करता है। इस स्थान पर कर्दम ऋषि ने अपनी पत्नी के साथ पुत्र की इच्छा के लिए तपस्या की थी। जिसे भगवान विष्णु की आंखों से जल बिन्दू गिरे थे। उसी स्थान पर यह सरोवर स्थित है। यहां पर विन्धेश्वरी देवी का पूज्य स्थान भी है। बरोट गांव में बटकेश्वर तीर्थ भी है।जिसे बटूकेश्वर महादेव से जोड़ा जाता है। हालांकि कुछ लोग बरोट का सम्बन्ध महर्षि वशिष्ठ से भी जोड़ते हैं।

बुधवार, 17 जून 2009

कामेश्वर महादेव

गांव रसूलपुर कैथल से उत्तर दिशा में 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां भगवान शिव का विशेष स्थान है। जिसे लोग कामेश्वर महादेव के नाम से जानते हैं। शास्त्रों के अनुसार देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए यही भगवान शिव की आराधना की थी। रसूलपुर की दूसरी खास बात यह भी है कि यह स्थान धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र की 48 कोस की पावन भूमि के पश्चिम में स्थित है ।

हव्य तीर्थ

हरियाणा में कैथल से 27 किलोमीटर की दूरी पर पूर्व दिशा में पूण्डरी-राजौन्द मार्ग पर भाणा नामक गांव स्थित है। जैसा कि हव्य शब्द से स्पष्ट है कि हव्य अर्थात् हवन की वस्तु। हवन के दौरान अग्नि में दी गई आहुति हव्य कहलाती है। जन-किंवदंतियों के अनसार एक बार इस स्थान पर परमपिता ब्रह्मा ने एक यज्ञ का आयोजन किया था जिसमें सभी देवी-देवताओ ने भोजन किया था। एक अन्य किंवदंती के अनुसार पाण्ड़वों ने कौरवों पर विजय प्राप्त करने के लिए यहां एक यज्ञ का आयोजन किया था। सूर्य और चंद्र ग्रहण के अवसर पर यहां लोग स्नान करते हैं। हव्य तीर्थ गांव से पूर्व दिशा में 25 एकड़ में फैला हुआ है। दक्षिण पूर्व तट पर एक ऊंचा शिव मन्दिर भी बना हुआ है।

शुक्रवार, 5 जून 2009

रस मंगल तीर्थ (सौंगल)

कैथल से पूर्व-दक्षिण दिशा में 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गांव सौंगल। एक जनश्रुति के अनुसार ब्रह्मा जी ने यहां देवताओं को सोमरस का पान करवाया था। सोमरस प्रदान करने के लिए जिस यज्ञ का आयोजन किया था। वह यज्ञ स्थल आज भी पांच एकड़ भूमि में फैला हुआ है। ऐसा माना गया है कि यहां 6 रसों की उत्त्पति हुई थी। एक अन्य लोकमान्यता के अनुसार वामन भगवान की स्थली है सौंगल। इस तीर्थ के विषय में महाभारत में लिखा है कि -
ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।
तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा व वामनम्।

सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णलोकमवानुयात।

(महाभारत वनपर्व 83/103/104)
अर्थात् ‘‘तदन्तर तीनों लोकों में प्रसिद्ध वामन नामक तीर्थ में जाना चाहिए। वहां विष्णुपद में स्नान करके भगवान वामन की आराधना करने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और मुक्त होने पर बैकुण्ठ धाम को चला जाता है।’’

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट