शुक्रवार, 8 मई 2009

तीर्थराज फल्गु

भारत की धरा पवित्र पर अनेक ऎसे स्थान हैं जिनके स्मरण मात्र से मानव का उद्धार संभव हो जाता है कई दिनों से विचार रहा था कि ऎसे ही कुछ स्थानों की जानकारी आपके साथ बांटी जाए सर्वप्रथम धर्मक्षेत्र कुरूक्षेत्र के एक तीर्थ से शुरू कर रहा हूँ :-
हरियाणा में कुरूक्षेत्र से २७ कि०मी० की दूरी पर कैथल जनपद में ढाण्ड और पूण्डरी के मध्य रल नामक गाँव स्थित है जहां फल्गु नाम का बड़ा प्रसिद्ध एवं पुण्यदायक तीर्थ है ऎसा माना जाता है कि इस स्थान पर कुरूक्षेत्र के सात वनों में से एक फल्कीवन ड़ता है हाँ श्री ल्गु षि जी ने तप किया तथा न्हीं ने ना से इस गांव का ना फरल ड़ा लोककिंवदंतियों के अनुसार श्री ल्गु ऋषि जी के तपस्या काल में ही बिहार में गया नामक स्थान पर गयासुर का राज्य था जिसने एक बार अपनी पुत्रियों के लिए स्वयंवर का आयोजन किया तथा शर्त रखी कि जो मुझे शास्त्रार्थ में हरा देगा , मैं उसके साथ अपनी कन्याओं का विवाह कर दूंगा गयासुर से त्रस्त लोगों के अनुरोध पर ऋषिवर गया गये और गयासुर को शास्त्रार्थ में हराकर उसकी कन्याओं के साथ विवाह किया तथा गृहस्थ धर्म में प्रवेश किया गयासुर ने अपने दामाद को भेंट स्वरुप वर देते हुए कहा कि आश्विन मास की सोमवती अमावस्या को जो पिंडदान का माहात्म्य होगा वह गयाजी में पिंडदान के माहात्म्यों से अधिक फल देने वाला होगा। इसके साथ ही फल्गु ऋषि को आशीर्वाद दिया कि आप गृहस्थ आश्रम में रहकर पितृऋण, ऋषिऋणतथा देवऋण तीनों ऋणों से मुक्त होकर संसार का आनंद लें। इसलिए इस अवसर पर फल्गु तीर्थ पर किया गया श्राद्धकार्य पितरों को गया के समान ही तृप्ति देने वाला होता है और इस दिन गया में श्राद्धादि कार्य नहीं होते
वामन पुराण में भी इसे स्पष्ट रुप से लिखा गया है वामन पुराण के ३६ वें अध्याय के ४९ वें और ५० वें श्लोक में वर्णित है :-
सोमक्षये च सम्प्राप्ते सोमस्य च दिन तथा ।
यः श्राद्ध च मत्यस्तस्य फलं पुण्यम् ॥४९॥
गंगायां च यथा श्राद्धं पितृन्प्रीणति नित्यशः
तथा श्राद्ध च कर्त्तव्य फल्कीवनमाश्रितैः ॥५०॥
अर्थात् सोमक्षय (अमावस्या) होने पर सोमवार के दिन जो मनुष्य श्राद्ध करता है ; उसे बहुत अधिक फल प्राप्त होता है ॥४९॥
गया जी में किया गया श्राद्ध जिस प्रकार पितरों को प्रसन्नता देता है उसी प्रकार फल्कीवन में किया गया श्राद्ध पितरों को प्रसन्नता देने वाला होता है ॥५०॥
एवमेव फल्कीवन के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए नारद पुराण में र्णित है :-
फल्गुतीर्थे विष्णुजले करोमि स्नानमद्य वै
पितृणां विष्णुलोकाय भुक्तिमुक्तिप्रसिद्धये
वायुपुराण में प्राप्त वर्णानुसार '' फल्कीवन में सोमावती अमावस्या के दिन किया गया श्राद्ध अधिक फल देने वाला होता है और फल्कीवन में इषद्वती नदी बहती है जिसके जल में स्नान करके श्राद्ध करने से पितर हरि को प्राप्त कर लेते हैं इस तीर्थ पर आश्विन मास में पितृपक्ष में सोमवार के दिन अमावस्या पड़ने पर किया जाने वाला श्राद्धकार्य पितरों को गया के समान ही तृप्ति देने वाला होगा ''
महाभारत ग्रन्थ में वन पर्व के 83और 84अध्याय में भी फल्गु माहात्म्य एवं फल्गु तीर्थ के महत्व का उल्लेख किया गया है। ऎसा भी माना जाता है कि कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद अपने रिश्तेदारों की मृत्यु से द्रवित होकर जब पांडव राज युधिष्ठिर ने अपने संताप एवं ग्लानि का जिक्र भगवान कृष्ण जी से करते हुए राहत एवं संतोष का मार्ग जानना चाहा तो भगवान कृष्ण ने उन्हें पितामह भीष्म के पास जाने का परामर्श दिया। युधिष्ठिर ने भीष्म-पितामह से आग्रह किया कि वे उन्हें संतोष प्राप्ति का ज्ञान दें। इस पर भीष्म ने उसे पवित्र कुरुक्षेत्र तीर्थ से 14कोस की दूरी पर स्थित फल्कीवन स्थित फल्गु तीर्थ का परिचय दिया और परामर्श दिया कि फल्गु तीर्थ में आश्विन मास की सोमवतीअमावस्या के दिन पिंडदान करने से उनके पितरोंको मोक्ष प्राप्त होगा इस स्थान की वर्तमान स्थिति की बात रें तो इस समय फल्गु तीर्थ पर कईं मन्दिर हैं जो वास्तुकला की दृष्टि से उत्तरमध्यकालीन प्रतीत होते हैं यहाँ स्थि मंदिरों में बसे प्रमुख मंदिर श्री फल्गु ऋषि जी का हैं जो सबसे प्राचीन है तथा जिसका निर्माण एक धर्मशाला के मध्य किया गया है। जिसके उपासक श्री जयगोपाल शर्मा जी हैं ; जो पुश्तैनी रुप से मन्दिर और धर्मशाला के कार्यकारी हैं इसके अलावा फल्गु तीर्थ पर श्री शिव मन्दिर , श्री दुर्गा मन्दिर , श्री राधा-कृष्ण मन्दिर भी स्थित हैं

1 Comment:

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

सचमुच पितृ शान्ती हेतु इस स्थान का बहुत ही महात्मय है......आभार

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